ख़राब समय से गुजर रही है देश सबसे बड़ी आईटी कंपनी ‘Infosys’ निवेशकों को भारी नुकसान
देश की सबसे बड़ी आईटी कंपनी इंफोसिस इन दिनों चर्चा का विषय बनी हुई है। चर्चा की वजह है मंदी, धीमा विकास दर और नौकरियों के जाने की वजह से देश की सबसे बड़ी आईटी कंपनी इन दिनों खबरों में आई है। ये जानकारी व्हिसलब्लोअर ने कंपनी के भीतर चल रही गड़बड़ी को उजागर किया है।
व्हिसलब्लोअर ने कंपनी के सीईओ सलिल पारेख और सीएफओ निलांजन रॉय के ऊपर आरोप लगाया है कि दोनों ने गलत तरीके से कंपनी की आय बढ़ाने की कोशिश की। दोनों पर आरोप है कि कंपनी को मुनाफे में दिखाने के लिए इन्होंने निवेश नीति और एकाउंटिंग से छेड़छाड़ भी की है।
आपको बता दें कि कंपनी में चल रही इस तरह की गड़बड़ी की खबरें जैसे ही बाहर आई तो कंपनी के शेयर टूटने लगे। बीएसई पर कंपनी के शेयर 15.99 फीसदी गिरकर 645.35 पर आ गए हैं तो वहीं एनएसई पर ये 15.90 घटकर 645 रुपए पर आ गए। कंपनी के शेयर में एक दिन में पिछले 6 साल में सबसे बड़ी गिरावट दर्ज की गई।
मिली जानकारी के मुताबिक, इंफोसिस का मार्केट कैप 3.28 लाख से गिरकर 2.83 लाख पर आ गया। लोगों को लगने लगा कि इसका हाल कहीं सत्यम कंप्यूटर की तरह तो नहीं होने वाला है। हांलाकि अब इंफोसिस के चेयरमैन नंदन नीलेकणि ने कहा है कि वो आरोपों की जांच करवा रहे हैं।
इतना ही नहीं सीईओ सलिल पारेख और सीएफओ निलांजन रॉय को इस जांच से दूर रहने के आदेश दिए गए हैं। बताते चले कि आईटी कंपनी देश की सबसे बड़ी कंपनियों में आती है जिसने अपनी स्थापना के कुछ सालों बाद जबरदस्त कामयाबी हासिल की है जो इन दिनों मुश्किलों के दौर से गुजर रही है।
इंफोसिस को आज से 38 साल पहले 7 दोस्तों ने मिलकर बनाई थी। इसमें सबसे आगे थे नारायण मूर्ति, मूर्ति ने अपने छह दोस्तों नंदन नीलेकणि, एनएस राघवन, एस गोपालकृष्णन, एसडी शिबूलाल, के अलावा के दिनेश और अशोक अरोड़ा के साथ मिलकर इंफोसिस की नींव रखी थी।
ये सभी पटनी कंप्यूटर्स के कर्मचारी थे। पटनी कंप्यूटर्स से अलग होकर उन्होंने अपना खुद का फर्म बनाया था। इस कंपनी की शुरुआत 10 हजार रुपए से हुई थी। नारायण मूर्ति ने कंपनी का नाम रखा- इंफोसिस कंसलटेंट। पैसों की कमी हुई तो उन्होंने अपनी पत्नी सुधा मूर्ति से कुछ उधार लिए।
नारायण मूर्ति के घर के सामने वाले रूम में कंपनी का दफ्तर बना हुआ है। हालांकि कंपनी का आधिकारिक दफ्तर राघवन के पते पर है। इंफोसिस के शुरू करने के पीछे सबसे बड़ा हाथ नारायण मूर्ति को माना जाता है। इंफोसिस के पास 1983 तक एक भी कंप्यूटर नहीं था।
कंपनी को पहला कंप्यूटर हासिल करने में 2 साल का वक्त लग गया। शुरुआती वर्षों में कंपनी के सामने मुश्किलें भी आईं। इंफोसिस उस वक्त संकट में आ गया, जब कंपनी के एक संस्थापक सदस्य अशोक अरोड़ा ने कंपनी छोड़ दी। इस मुश्किल घड़ी में नारायणमूर्ति सामने आए।
उन्होंने अपने बाकी सदस्यों से कहा कि जिसे भी कंपनी छोड़कर जाना है जा सकता है लेकिन वो आखिरी वक्त तक इसके साथ रहेंगे। उनकी बातों का असर हुआ और नंदन नीलेकणि, गोपालकृष्णन, शिबूलाल, दिने और राघवन ने कंपनी से जुड़े रहे।
एक बार नारायणमूर्ति की पत्नी सुधा मूर्ति ने एक इंटरव्यू में बताया कि इंफोसिस शुरू करते वक्त नारायण मूर्ति अक्सर उससे पैसे उधार लिया करते थे। सुधा उधार दिए पैसों का हिसाब रखती थीं और उसे एक डायरी में दर्ज करती थीं। नारायणमूर्ति ने सुधा को वो पैसे कभी नहीं लौटाए।
जब दोनों की शादी हो गई तो सुधा मूर्ति ने उधार वाले पन्ने को अपनी डायरी से फाड़ दिया। सुधा मूर्ति ने बताया था कि नारायणमूर्ति ने करीब 4 हजार रुपए उधार लिए थे। 1993 में पहली बार कंपनी आईपीओ लेकर आई। 14 जून 1993 को इंफोसिस देश की पहली आईटी कंपनी बनी जिसे शेयर बाजार ने लिस्ट किया।
इंफोसिस जब आईपीओ लेकर आई तो इसका इश्यू प्राइस था 95 रुपए लेकिन शेयर बाजार में लिस्ट होने के दिन इसका शेयर 145 रुपए पर लिस्ट हुआ। कंपनी की साख इसी से पता चलती है। 1999 तक इंफोसिस की स्थिति काफी अच्छी हो चुकी थी। कंपनी का नेटवर्थ 100 मिलियन डॉलर पहुंच चुका था।
इंफोसिस भारत की पहली आईटी कंपनी थी जिसे नैसडैक ने लिस्ट किया। इंफोसिस दुनिया की 20 बड़ी आईटी कंपनियों में से एक है। आज इंफोसिस पूरी दुनिया में अपनी सेवाएं दे रही हैं। कंपनी के 50 हजार कर्मचारी दुनियाभर के 12 देशों में फैले हैं।