कविता
आखिरी साँसों तक : कितने सच कितने झूठ?
बिगड़ते हालातो को देखते हुए उनकी,
परिजन अस्पताल में भर्ती कराते हैं,
वो ठीक हो कर आएंगे कोरोना से
डॉक्टर और स्टाफ पर परिजन ये विश्वास जमाते हैं,
उखड़ती हुई साँसों के बीच ऑक्सीजन की सुविधा उनको दी जाती है कुछ ही समय मे हो जायेगें ठीक,
ये सांत्वना परिजनों को दी जाती है,
कुछ समय लगेगा, चिंता ना कीजिए सब ठीक हो जाएगा,
आप घर लौट कर जल्दी आएंगे
ये हिम्मत देते हैं हम उनको,
बुरा वक्त है जल्दी ही निकल जायेगा,
अस्पताल से तसल्ली दी जाती है,
आपका रोगी ठीक है, उनका ख्याल रखा जा रहा है,
*अजीज* का फ़ोन आता है, मुझे यहां से निकाल लो, मुझे ना एक बूंद पानी की और ना कुछ खाने को दिया जा रहा है,
बड़े बड़े अफसरों से कह कर अनुरोध किया जाता है,
तब शायद हमारे *अजीज* को कुछ खाने को दिया जाता है,
अपने *अजीज* की तबियत पूछने को अस्पताल में फ़ोन किया जाता है अरे, आपका *मरीज* तो बिल्कुल ठीक है ऑक्सीजन 80 पर है ये बताया जाता है,
खुद को तसल्ली दे कर परिजन सुकून से बैठ जाते हैं,
कुछ समय बाद *अजीज* का फोन आया,
मेरी सांसे उखड़ रही हैं,,,लेवल 50 से नीचे है,,सुनते ही सब बिखला जाते हैं,
बार-बार पूछने पर भी अस्पताल वाले सच्चाई नही बतलाते हैं,आखिर क्यों .... ये लापरवाही वो बरत जाते हैं,
*अजीज* ज़िंदगी और मौत से लड़ते-लड़ते हार जाते हैं,
ना जाने उनकी आखिरी सांसो तक कितने सच और कितने झूठ बोले जाते हैं।
Sakshi Sharma
(रूहाक्षी)
