स्वरचित कविता
स्वरचित कविता
*(मैं ब्याही पराये देश)*
पापा मैं क्यो परायी
क्यो बनाया नारी भेष?
भैया को दिए महले दो महले
मैं ब्याही पराये देश।
मैं आपकी गाय जैसी
चाहे जिस खूँटी पर बाँध दो,
हाँक-हाँक कर इस गाय को
जो चाहो चारा डाल दो।
माँ की ममता भैया का प्यार
इनसे ना अलग करो
जैसे रखोगे वैसे रह लूँगी
पापा मुझको ना जुदा करो।
आपकी हँसी भाती हैं मुझे
देख सुकून मिलता है।
आपसे अलग हो जाऊं मैं
ये सोचकर भी डर लगता हैं।
जाने कैसे होंगे वे लोग
कैसा व्यवहार करेंगे मेरे साथ
रो-रो कर विनती करती हूँ आपसे
ना छुड़ाओ पापा मुझसे हाथ।
नही रख सकता मेरी बिटिया तुझको
तू तो पराया धन हैं।मेरे बाद कोई अच्छा साथी मिल जाये तुझको,बस इतना ही मेरा मन है। *सुषमा पाल*
*पूर्व छात्र संघ कोषाध्यक्ष* *श० म० पा० महिला स्नातकोत्तर महाविद्यालय मेरठ।*
